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क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम, क्षेत्रवाद के निष्कर्ष एवं सुझाव

 क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम, क्षेत्रवाद के निष्कर्ष एवं सुझाव




क्षेत्रवाद का दुष्परिणाम:-

1: संकीर्ण नेतृत्व का विकास:-
 क्षेत्रवाद का सबसे बुरा परिणाम ऐसे  स्वार्थ नेताओं की संख्या में वृद्धि होना है जो क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का कर अपने स्वार्थ को पूरा करने में रहते हैं,

 2: राष्ट्रीय के विकास में बाधा:-
 प्रत्येक क्षेत्र के लोग  अधिक से अधिक अधिकारों और सुविधाओं की मांग को लेकर एक दूसरे के विरुद्ध बनाए जाते हैं, 

 3:सामाजिक न्याय के लिए चुनौती:-
 क्षेत्रवाद सामाजिक न्याय के सभी सिद्धांतों को दूर कर देता है क्षेत्रवाद की भावना ना तो व्यक्ति की कुशलता को महत्व देती है, 

और ना ही क्षेत्र के अनुसार आवश्यकता को इसका एक मात्र आधार  व्यक्ति की कुशलता को मूल्यांकन  उसीकी  क्षेत्रीय स्थिरता के आधार पर करना होता है,

4 : क्षेत्रीय तनाव:-
 क्षेत्रीय आधार पर कारखानों का निर्माण, विश्वविद्यालयों की स्थापना,  प्राकृतिक साधनों का बंटवारा जैसे विषयों को लेकर वर्तमान में जिस प्रकार के विवाद बढ़ते जा रहे हैं, 

 उसे क्षेत्रीय तनाव की स्थिति भी बहुत अधिक गंभीर बनती जा रही है, 

5: प्रगति में बाधा:-
 क्षेत्रवाद आंदोलनकारी भावनाओं को बढ़ावा देकर सामाजिक प्रगति में बाधा पहुंच जाती है,

6: भाषा की समस्या:-
 भाषा की समस्या के कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क टूटने लगता है और क्षेत्रवाद की समस्याएं उलझने के स्थान पर अधिक उलझ जाते हैं, 

 निष्कर्ष और सुझाव:-

 1:-सरकार द्वारा नीतियों का निर्माण देश के हित में हो ना कि किसी क्षेत्र विशेष के हित में,

 2:- विकास का क्रम इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे सभी क्षेत्रों का संतुलित विकास हो सके,

 3:- क्षेत्रवाद को दूर करने के लिए सभी क्षेत्रों को एक दूसरे से जोड़ने वाला एक सामान्य आधार ढूंढना होगा और यह कार्य किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा की घोषणा से पूरा किया जा सकता है, 

 4 :-क्षेत्रीया भाषाओं का आदर करना और उन्हें मजबूत बनाने के लिए प्रयास करना अधिक आवश्यक है.




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